नवरात्र में 50 हजार से अधिक श्रद्धालु रोज कर रहे दर्शन
आगर-मालवा। आगर-मालवा जिले की लखुंदर नदी के तट पर स्थित श्री बगलामुखी माता मंदिर न सिर्फ एक धार्मिक स्थल है, बल्कि तंत्र साधकों का सबसे बड़ा पीठ भी माना जाता है। मान्यता है कि यहां विराजित मां बगलामुखी जागृत स्वरूप में हैं। यह मंदिर जितना भव्य है, उतना ही रहस्यमयी भी। यहां होने वाले अनुष्ठान और परंपराएं मंदिर को अद्वितीय बनाते हैं।
महाभारत से जुड़ी मान्यता
मंदिर के पुजारी पं. मनोहर दास के अनुसार, यह स्थान महाभारत कालीन है। जब पांडव विपत्ति में थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यहां मां बगलामुखी की उपासना का मार्ग बताया। पांडवों ने इस त्रिगुण स्वरूपा (महालक्ष्मी, सरस्वती और बगलामुखी) की साधना कर विजयश्री प्राप्त की और अपना राज्य पुनः हासिल किया। तभी से यहां शत्रुनाशक यज्ञ और विशेष अनुष्ठानों की परंपरा शुरू हुई।
श्मशान और नदी से घिरा अनोखा स्थान
मां बगलामुखी को तंत्र साधना की देवी माना जाता है। यही कारण है कि मंदिर की चारों दिशाओं में श्मशान-कब्रिस्तान और पास में लखुंदर नदी होने से यह स्थान साधना के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
मंदिर का गर्भगृह स्वर्ण और चांदी से आभामंडित है – करीब 3 करोड़ रुपए का सोना और 65 लाख रुपए की चांदी यहां अर्पित की गई है। मंदिर प्रांगण में 80 फीट ऊंची दीपमाला और आसपास भैरव, हनुमान और राधा-कृष्ण मंदिर भी स्थित हैं।
पूजा में पीले रंग का विशेष महत्व
मां बगलामुखी का स्वरूप पीताम्बर धारण किए हुए है। इसलिए यहां पीले रंग का विशेष महत्व है। श्रद्धालु पीली चुनरी, पीले फूल, पीला प्रसाद और हल्दी अर्पित करते हैं। यह संभवतः देश का एकमात्र मंदिर है, जहां मां को पूजा में खड़ी हल्दी और हल्दी पाउडर चढ़ाया जाता है।
अनुष्ठान और तंत्र साधना
यहां 190 रजिस्टर्ड पंडित हैं, जो मिर्ची अनुष्ठान, विजय यज्ञ, शत्रु नाशक यज्ञ, संतान प्राप्ति, कोर्ट केस से छुटकारा, चुनाव में जीत और काम की बाधा दूर करने के अनुष्ठान करवाते हैं।
- मिर्ची अनुष्ठान में एक क्विंटल लाल मिर्च और औषधियों से यज्ञ किया जाता है।
- अनुष्ठान के लिए 350 रुपए से 5100 रुपए तक की सरकारी रसीद काटी जाती है।
- नवरात्रि में भीड़ को देखते हुए फिलहाल मंदिर परिसर में मिर्ची अनुष्ठान पर रोक है, लेकिन बाहर यह जारी है।

नवरात्रि में लाखों की आस्था उमड़ी
नवरात्रि में रोजाना 40 से 50 हजार श्रद्धालु मंदिर पहुंच रहे हैं। रविवार को यह संख्या दोगुनी हो जाती है। मंदिर में 114 हवन कुंड बने हुए हैं, जहां रोजाना 800 से ज्यादा हवन हो रहे हैं। भक्त ऑनलाइन हवन-कुंड बुक करवा सकते हैं।
मंदिर प्रबंधन के मुताबिक –
- नवरात्रि के नौ दिन तक भंडारा चलता है।
- नवमी पर 1000 कन्याओं का पूजन होता है।
- जवारे का विसर्जन लखुंदर नदी में कर पर्व का समापन किया जाता है।
क्यों खास है यह मंदिर?
- यहां की मूर्ति स्वयंभू और जागृत है।
- पूजा में केवल पीले रंग की सामग्री चढ़ाई जाती है।
- तंत्र साधना और मिर्ची अनुष्ठान विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।
- महाभारत काल से लेकर आज तक इस स्थान पर शत्रुनाशक और विजयप्राप्ति की परंपरा है।
👉 यही कारण है कि नवरात्रि के पावन दिनों में नलखेड़ा का यह मंदिर श्रद्धा, शक्ति और तंत्र साधना का अद्वितीय संगम बन जाता है।





