उदयपुर

उदयपुर के एमबी हॉस्पिटल में फायर मॉक ड्रिल से हड़कंप: सुरक्षा उपकरण कम, स्टाफ की ट्रेनिंग में खामियां उजागर

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उदयपुर | राजस्थान के एमबी हॉस्पिटल, उदयपुर में गुरुवार सुबह अचानक तब अफरा-तफरी मच गई जब अस्पताल की सुपर स्पेशियलिटी विंग के चौथे फ्लोर से आग लगने की सूचना मिली। मरीजों और परिजनों में घबराहट फैल गई, फायर ब्रिगेड की तीन गाड़ियाँ मौके पर पहुंचीं और तत्काल आग पर काबू पाने की कवायद शुरू हुई।

कुछ ही देर में यह स्पष्ट हुआ कि यह घटना असल आग नहीं बल्कि फायर सेफ्टी मॉक ड्रिल का हिस्सा थी। इस ड्रिल का उद्देश्य अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था, फायर फाइटिंग सिस्टम और स्टाफ की अलर्टनेस की जांच करना था। हालांकि, इस दौरान कई खामियां सामने आईं — सुरक्षा उपकरणों की कमी और कर्मचारियों की प्रशिक्षणहीनता प्रमुख रही।


चौथे फ्लोर से उठता धुआं और फायर अलार्म से मचा हड़कंप

सुबह करीब 11 बजे अस्पताल के सुपर स्पेशियलिटी विंग में अचानक फायर अलार्म बज उठा। चौथे फ्लोर से धुआं उठने लगा, जिससे मरीजों और उनके परिजनों में हड़कंप मच गया। सूचना मिलते ही नगर निगम की तीन फायर ब्रिगेड गाड़ियाँ अस्पताल पहुंचीं। कुछ ही मिनटों में फायरमैन ने पाइपलाइन जोड़कर “आग” पर काबू पाने की कार्रवाई शुरू कर दी।

ड्रिल के दौरान डमी मरीजों को स्ट्रेचर और व्हीलचेयर के माध्यम से बाहर निकाला गया, जिससे यह स्थिति वास्तविक लगने लगी। कई लोग इस दौरान वीडियो बनाते और फोटो खींचते नजर आए।

अस्पताल परिसर में कुछ समय के लिए अफरा-तफरी का माहौल रहा, लेकिन बाद में जब यह बताया गया कि यह मॉक ड्रिल है, तब सभी ने राहत की सांस ली।


जयपुर की घटना के बाद पूरे राजस्थान में मॉक ड्रिल का आदेश

हाल ही में जयपुर के एसएमएस अस्पताल में आग लगने से कई मरीजों की मौत हुई थी। उस घटना के बाद राज्य सरकार ने सभी बड़े अस्पतालों में फायर सेफ्टी जांच और मॉक ड्रिल आयोजित करने के निर्देश जारी किए थे।

उसी क्रम में उदयपुर के एमबी अस्पताल में गुरुवार को यह ड्रिल की गई। ड्रिल के दौरान न केवल अस्पताल की फायर सेफ्टी प्रणाली की जांच हुई, बल्कि फायर ब्रिगेड, क्यूआरटी, पुलिस और नागरिक सुरक्षा विभाग की टीमों की सक्रियता और तत्परता का भी आकलन किया गया।


खामियां उजागर: उपकरणों की कमी और स्टाफ की अपर्याप्त ट्रेनिंग

एडीएम सिटी जितेंद्र ओझा और अस्पताल अधीक्षक डॉ. आर.एल. सुमन ने मौके पर स्थिति का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान कई खामियां सामने आईं। अस्पताल परिसर में सुरक्षा उपकरणों की संख्या सीमित पाई गई। वहीं, मौजूद कर्मचारियों को आग बुझाने का उचित प्रशिक्षण नहीं था।

डॉ. आर.एल. सुमन ने बताया कि —

“यह मॉक ड्रिल उच्च स्तर से मिले निर्देशों के तहत की गई थी। उद्देश्य यह था कि किसी भी आकस्मिक आग की स्थिति में स्टाफ और सिस्टम की तत्परता परखा जा सके। ड्रिल से हमें यह समझने में मदद मिली कि कहां सुधार की जरूरत है।”

एडीएम ओझा ने भी माना कि फायर सेफ्टी सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सभी संबंधित विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि स्टाफ को नियमित प्रशिक्षण दिया जाए और फायर फाइटिंग इक्विपमेंट्स की संख्या बढ़ाई जाए।


रेस्क्यू ऑपरेशन में फायर टीम और स्टाफ की तत्परता

मॉक ड्रिल के दौरान यह परखा गया कि आग लगने की स्थिति में मरीजों को कितनी तेजी और सुरक्षा के साथ बाहर निकाला जा सकता है। इस क्रम में डमी मरीजों को स्ट्रेचर, बेड और व्हीलचेयर के सहारे बाहर लाया गया।

फायर ब्रिगेड की टीम ने बिल्डिंग के अंदर प्रवेश कर काल्पनिक आग पर “काबू” पाया। इस दौरान क्यूआरटी (क्विक रिस्पॉन्स टीम), अस्पताल सुरक्षा गार्ड और नागरिक सुरक्षा विभाग के कर्मी भी सक्रिय रहे।

हालांकि, कुछ जगहों पर फायर एक्सटिंग्विशर काम नहीं कर रहे थे और पाइपलाइन में प्रेशर कम पाया गया। इस पर अधिकारियों ने तत्काल सुधार के निर्देश दिए।


प्रशासन ने माना – फायर सेफ्टी को लेकर नियमित समीक्षा जरूरी

ड्रिल के बाद प्रशासनिक टीम ने अस्पताल का विस्तृत निरीक्षण किया। एडीएम दीपेंद्र सिंह, आरएनटी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. विपिन माथुर सहित कई वरिष्ठ अधिकारी इस मौके पर मौजूद रहे।

अधिकारियों ने माना कि ऐसी मॉक ड्रिल्स को केवल औपचारिकता न मानकर, वास्तविक तैयारी के रूप में किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, सभी बड़े अस्पतालों में हर तीन महीने में फायर सेफ्टी ऑडिट और ड्रिल दोहराई जाएगी।


मरीजों और परिजनों की प्रतिक्रिया

ड्रिल की शुरुआत में जब फायर अलार्म बजा और चौथे फ्लोर से धुआं उठा, तो कई मरीज और उनके परिजन घबरा गए। बाद में जब पता चला कि यह सिर्फ मॉक ड्रिल है, तो लोगों ने राहत महसूस की, लेकिन कई ने यह भी कहा कि ऐसी घटनाओं से “तैयारी का असली स्तर” सामने आता है।

एक मरीज के परिजन ने कहा —

“पहले तो हम बहुत डर गए थे, लगा कोई हादसा हो गया। लेकिन जब पता चला कि यह अभ्यास है, तो अच्छा लगा कि प्रशासन सचेत है, हालांकि कुछ नर्सों और कर्मचारियों को यह नहीं पता था कि क्या करना है।”


विशेषज्ञों की राय: आग से निपटने की तैयारी में कमी

फायर सेफ्टी विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी अस्पतालों में अधिकतर जगह फायर अलार्म और स्प्रिंकलर सिस्टम तो लगे होते हैं, लेकिन उनकी मेंटेनेंस और स्टाफ ट्रेनिंग में बड़ी कमी रहती है। एमबी हॉस्पिटल की मॉक ड्रिल ने यह स्पष्ट कर दिया कि सुरक्षा के प्रति सतत सतर्कता और प्रशिक्षण बेहद आवश्यक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह वास्तविक आग होती, तो प्रशिक्षित स्टाफ की कमी और उपकरणों की अनुपलब्धता बड़ा खतरा बन सकती थी।


निष्कर्ष

उदयपुर के एमबी हॉस्पिटल में हुई यह फायर मॉक ड्रिल, जयपुर एसएमएस अस्पताल में हुए दर्दनाक हादसे के बाद राज्य सरकार की सतर्कता का हिस्सा थी। हालांकि ड्रिल ने राहत की भावना तो जगाई कि आपात स्थिति में सिस्टम सक्रिय हो सकता है, लेकिन साथ ही यह भी उजागर किया कि अस्पतालों में सुरक्षा उपकरणों की संख्या और स्टाफ की ट्रेनिंग पर अभी और काम करने की आवश्यकता है।

राज्य सरकार द्वारा अस्पतालों को सुरक्षित बनाने की दिशा में यह एक सराहनीय पहल है। मगर असली सुरक्षा तब सुनिश्चित होगी जब यह अभ्यास सिर्फ कागजों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर पर लागू किया जाएगा — ताकि किसी भी वास्तविक आग की स्थिति में हर मरीज की जान सुरक्षित रहे।